Posted On:Wednesday, October 25, 2017

कृषि अपशिस्ट प्रबंधन एवं सूक्ष्मजीव संसाधनों के कृषिगत अनुप्रयोग



प्रेस आख्यान
कृषि अपशिस्ट प्रबंधन एवं सूक्ष्मजीव संसाधनों के कृषिगत अनुप्रयोग
पर कृषक प्रशिक्षण कार्यक्रम
कृषि विज्ञान केंद्र, आजमगढ़
दिनांक 24.10.2017


कृषि विज्ञान केंद्र, आजमगढ़ के सभागार में दिनांक 24.10.2017 को प्रातः 11 बजे से राष्ट्रीय कृषि उपयोगी सूक्ष्मजीव ब्यूरो, मऊ में संचालित राष्ट्रीय कृषि विकास योजना के अंतर्गत आयोजित एक कृषक प्रशिक्षण कार्यक्रम का आयोजन किया गया जिसमें जिसमें आसपास के कई गांव के १०० से अधिक प्रगतिशील एवं उन्नतशील किसानों की सहभागिता रही . इस प्रशिक्षण कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य गांवों एवं आसपास के उन्नतशील किसानों में कृषि में बढ़ती लागत और कृषि पारिस्थितिकी में रसायनों के अधिकाधिक उपयोग से होने वाले नुकसान के विषय में सचेत करना एवं उन्हें वर्त्तमान में उपलब्ध सूक्ष्मजीव आधारित कृषि पद्धतियों के विषय में समुचित जानकारी प्रशिक्षण एवं प्रदर्शन के माध्यम से उपलब्ध करना था. साथ ही कार्यक्रम वर्तमान में उपलब्ध सूक्ष्मजीव आधारित कृषि पद्धतियों को अपनाने एवं कृषि अपशिस्टों को बायोकम्पोस्ट में परिवर्तित करके इसे आजीविका का साधन तैयार करने पर भी केंद्रित था जिससे उन्नतशील किसान अपनी फसलों एवं मिट्टी के स्वास्थ्य के साथ साथ स्वयं के स्वास्थ्य और पर्यावरण पर कृत्रिम रसायनों के बढ़ते दुष्प्रभाओं के प्रति सजग हो सकें. इस कार्यक्रम में तकनिकी प्रशिक्षण हेतु किसानों को तकनिकी पुस्तिका और ट्रेनिंग किट के साथ ही साथ विभिन्न प्रकार के सूक्ष्मजीव अनुकल्प निशुल्क रूप से प्रदान किया गया. साथ ही उद्यमिता हेतु बायोकम्पोस्ट उत्पादन करने में इच्छुक एवं तत्पर किसान समूहों में बायोकन्वर्शन किट का भी वितरण किया गया जिससे गांव के किसान इन पद्धतियों को तत्परता के साथ आने वाली रबी की फसल में सफलतापूर्वक उपयोग करके योजना का अधिकाधिक लाभ ले सकें.
इस प्रशिक्षण कार्यक्रम के मुख्य अतिथि आजमगढ़ मंडल के मंडलायुक्त श्री के रबिन्द्र नायक थे. इस अवसर पर मुख्य अतिथि ने कहा कि वर्तमान परिदृश्य में कृषि और उस पर समग्र आर्थिक, सामाजिक एवं भावनात्मक रूप से जुड़े किसानों की समस्याओं की तरफ ध्यान आकर्षण अपने आप में सबसे महत्वपूर्ण विषय होता जा रहा है. उन्होंने वैकल्पिक खेती पर जोर देने की बात कही जिससे खपत का संतुलन बनाये रखा जाय। स्थिति चिन्ताजनक तब और ज्यादा हो जाती है जब अन्नदाताओं को अपनी, मिट्टी और फसलों आदि को सुरक्षित न रख पाने की स्थिति से उपजे आर्थिक बोझ के तले दबकर अपनी जिंदगियां गँवानी पड़ रही हैं. संयुक्त निदेशक कृषि डर एस के सिंह ने कहा ककि सीमित होते खेत, सिकुड़ती जमीन की माप, कम होते संसाधन, आर्थिक अभाव, बिगड़ती पर्यावरण और मिट्टी की सेहत, पौधों के संरक्षण और सुरक्षा का बढ़ता बोझ, बीज जैसे संसाधनों की उच्च गुणवत्ता एवं अनुपलब्धता, और उसमे भी समग्र रूप से समय पर विषयगत जानकारी की कमी, ये कुल ऐसे कारक सिद्ध हो रहे हैं जिसने कृषि को और उसमें किसानों की रूचि को बुरी तरह प्रभावित किया है. इन समस्त कारकों ने वास्तव में कृषि पर आधारित किसानों और उनके परिवारों की आर्थिक रीढ़ को भी नुकसान पहुँचाया जिससे उनकी समस्याएं अधिकाधिक जटिल होती गयीं और आलम ये है कि भावी पीढ़ी कृषि पर ही जीवन यापन से कतराने लगी है. उन्होंने कहा कि किसान नवीन तकनीकियों के माध्यम से अच्छे कम्पोस्ट का उत्पादन करें जिससे मिट्टी की गुणवत्ता अच्छी हो सकती है।
उपस्थित कृषि वैज्ञानिक डॉ आर के सिंह ने कहा कि रसायनों के अनियंत्रित प्रयोग से चूँकि मिट्टी की रासायनिक एवं जैविक संचरना में लगातार गिरावट जारी है, और उसकी कार्बनिक तत्वों की ग्राह्यता में भारी कमी आ गयी है, इसलिए जैविक उपायों का असर कम ही देखा जा रहा है क्यूंकि सूक्ष्मजीवों को उनका आधारभूत पोषण कार्बन तत्व के रूप में मिट्टी में बहुत ही कम है. ब्यूरो के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. रेणु ने मुख्य अतिथि एवं किसानो को ब्यूरो की स्थापना और इसके द्वारा किये जा रहे कार्यकलापों पर विस्तार से बताया.
परियोजना के प्रमुख अन्वेषक एवं ब्यूरो के प्रधान वैज्ञानिक डॉ. डी. पी. सिंह ने अपने सम्बोधन में कहा कि फसल उत्पादन को प्रभावित करने वाले बहुत से कारकों में मूल रूप से बीज की गुणवत्ता, और मिट्टी का स्वास्थ्य दोनों बेहद महत्वपूर्ण हैं. स्वस्थ मिट्टी न होने की वजह से कई बार पौधों को पोषक तत्व उपलब्ध नहीं होते. साथ ही कई बार मृदाजनित या बीजजनित जीवाणुओं और फफूंदों के कारण अंकुरण बुरी तरह से प्रभावित होता है. इन दोनों हे स्थितियों में, चाहे पोषक तत्वों की कमी हो, बहुतायत हो, या फिर रोगकारक जीवाणु या फफूंद मिट्टी या पौधों के साथ हों, किसानों को कृत्रिम रसायनों पर निर्भर होना पड़ता है. कृत्रिम रासायनिक खादों या कीटनाशक दवाओं के उपयोग में व्यवहारिक समस्या ये होती है कि या तो इनके उपयोग के समय, स्थान, कारण आदि के बारे में समुचित जानकारी देर से मिलने पर इनका उपयोग प्रभावी नहीं हो पाता या फिर कई बार अधिकाधिक उपयोग किये जाने की स्थिति में दुष्प्रभाव सामने आते हैं. आज वास्तव में रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के अनियंत्रित उपयोग के दुष्प्रभाव मिट्टी, पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य पर परिलक्षित होने लगे हैं और इससे सबसे ज्यादा मिट्टी की उर्वरता, उसकी रासायनिक और भौतिक संचरना और उसका जैविक विन्यास प्रभावित हुआ है. समय आ गया है कि हम अब इस दिशा में मंथन करें और वैकल्पिक उपायों पर गौर करके उन्हें कृषि पद्धतियों में उचित स्थान दें जिससे कृषि रसायनों पर किसानों की निर्भरता कम की जा सके, साथ ही खेती पर आने वाली लागत पर नियंत्रण पाया जा सके और पर्यावरण के स्वास्थ्य, जिससे खुद का स्वास्थ्य भी जुड़ा है, की रक्षा की जा सके.
इसी क्रम में राष्ट्रीय कृषि उपयोगी सूक्ष्मजीव ब्यूरो के वैज्ञानिक डॉ. डी पी सिंह, डॉ. रेनू एवं डॉ. प्रमोद साहू सूक्ष्मजीवों के समन्वित उपयोग को बढ़ावा देने हेतु किसानो के साथ मिलकर उनके खेतों में ही कई तरह के प्रयोग कर रहे हैं जिससे इस तकनीकियों को किसानो तक पहुंचाने तथा उसे आत्मसात करने में मदद मिल सके. वैज्ञानिकों की यह टीम किसान के खेत-खलिहानों और घरों के आस-पास पड़े रहने वाले एग्रो-वेस्ट को त्वरित रूप से कम समय और लागत में ही उच्च गुणवत्तायुक्त जैव-खाद में परिवर्तित कर लेने हेतु भी प्रेरित कर रही है. जैव-उत्परिवर्तन तकनीकियों के माध्यम सूक्ष्मजीवों के उपयोग से यह संभव है और इसके साथ ही उत्पादित जैवखाद का गुणवत्ता उन्नयन करके इसे अन्य और खास तौर पर कमर्शियल खेती करने वाले किसानों को बेचा भी जा सकता है जिससे किसानों को अतिरिक्त लाभ की प्राप्ति संभव है.
डॉ. एस के यादव, प्रोग्राम कोऑर्डिनेटर ने कार्यक्रम में किसानो को बताया कि मिट्टी की पोषकता में वृद्धि करने वाले सूक्ष्मजीव जैसे नाइट्रोजन स्थिरिकारक, फास्फोरस एवं पोटाश विलायक, पौधों की जड़ों तक ज़िंक एवं लौह तत्व पहुंचाने वाले जीव, के साथ ही समन्वित रूप से जैविक रोग एवं कीट नियंत्रक फफूंद एवं जीवाणु जैसे ट्राइकोडर्मा, सूडोमोनास, बैसिलस, बीवेरिया और कृमिनाशिनाशी जीवों का उपयोग फसल के विभिन्न बढ़वार चरणों में किया जा सकता है. बस शर्त यही है कि इन जीवों के उपयोग के साथ ही इनको शुरूआती पोषकता प्रदान करने के लिए जैविक कम्पोस्ट का उपयोग आवश्यक है. डॉ. प्रमोद साहू के अनुसार चूँकि किसानों के पास आम तौर पर जैविक खाद की उपलभ्धता कम हो गयी गई है, जैवखाद को सूक्ष्मजीवों के अनुकल्पों के साथ मिलाकर उसे खेतों में फसलों के उत्पादन हेतु प्रयोग किया जा सकता है जिससे रासायनिक खादों पर निर्भरता को आंशिक रूप से ही सही, पर कम किया जा सकता है. कुछ सालों (३-४ साल) के बारम्बार प्रयोग से मिट्टी जीवों की वृद्धि इस कदर संभव है कि ये खुद ही अपना प्रभाव स्थापित करने में सफल होंगे. कुल मिलाकर इससे कृषि में रसायनों के उपयोग को कम करने, लागत घटाने, मिट्टी स्वास्थ्य संक्षरण, पौध बढ़वार एवं फसल सुरक्षा, और सबसे ऊपर मानव स्वास्थ्य को सुरक्षित रखने में सहायता मिलेगी.
इस अवसर पर कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिक डॉ. रूद्र प्रताप सिंह ने किसानो को खेतों में रोगों एवं कीटों से होने वाले नुक्सान से बचाव हेतु रासायनिक विकल्पों के स्थान पर सूक्ष्मजीव आधारित कृषि पद्धतियों पर ध्यान दिए जाने की बात कही. कार्यक्रम में जैव उत्परिवर्तन हेतु प्रयोग होने वाले कई सूक्ष्मजीवों के अनुप्रयोग पर प्रदर्शन किये गए .
कार्यक्रम के उद्घाटन सत्र में किसानों में जैवउत्परिवर्तन से बायोकम्पोस्ट बनाने पर ब्यूरो के निदेशक डॉ. अनिल सक्सेना के निर्देशन में वैज्ञानिकों डॉ. डी पी सिंह, डॉ. रेनू, एवं डॉ. प्रमोद साहू द्वारा तैयार की गयी तकनिकी पुस्तिका का मुख्य अतिथि द्वारा विमोचन किया गया. साथ विशेष सूक्ष्मजीवों के प्रभाव द्वारा त्वरित जैवउत्परिवर्तन के माध्यम से कम समय में ही बायो कम्पोस्ट बनाने की एक इकाई का शुभारम्भ भी किया गया जिसके माध्यम से कृषि विज्ञान केंद्र में भविष्य में होने वाले किसान प्रशिक्षण कार्यक्रमों में किसानो को इन विधियों का प्रशिक्षण देकर प्रोत्साहित किया जा सके. कार्यक्रम के दौरान वृक्षारोपण को बढ़ावा देने हेतु कृषि विज्ञान केंद्र के प्रांगण में ही मुख्य अतिथि एवं ब्यूरो के निदेशक द्वारा आम के वृक्षों का रोपण किया गया जिसमे जैव उत्परिवर्तन तकनिकी द्वारा कृषि अपशिष्टों से उत्पादित बायो कम्पोस्ट का उपयोग किया गया. प्रशिक्षण कार्यक्रम में ब्यूरो के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. आलोक श्रीवास्तव, डॉ. अभिजीत कश्यप, डॉ. नाजिया मंजर, डॉ. विवेक सिंह आदि ने भाग लिया. इसके अतिरिक्त ब्यूरो कर्मियों सर्वश्री राम अवध, अजय, रबिन्द्र, संजय, आदि ने तकनिकी प्रदर्शन में सहयोग किया. प्रगतिशील किसान अखिलेश राम, विजय बहादुर सिंह, आदि ने भी अपने विचार व्यक्त किये। प्रशिक्षण कार्यक्रम में कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिकों की विशेष सहभागिता रही.